काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

काशी विश्वनाथ दो भागों में विभाजित है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में माँ भगवती जी विराजमान है। तो वहीं दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप में विराजमान है। इसलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है।

ऐसा मानना है की देवी भगवती जिन के दायीं ओर विराजमान होने पर मुक्ति मार्ग केवल काशी में ही खुलता है। और यहीं पर मनुष्य को मुक्ति मिलती है और ऐसा भी कहा जाता है की यहाँ विराजमान होने के बाद दुबारा गर्भधारण नहीं किया जाता है। माना जाता है की भगवान शिव स्वतः यहाँ पर आकर लोगोंको तारक मन्त्र देकर उनको मुक्ति देते है। और अकाल मृत्यु से मारा व्यक्ति बिना भगवान शिव के आराधना के कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता है।

इसमें एक खास बात ये भी है की शृंगार के समय यहाँ की सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होते है कहा  जाता है की इस शिवर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों दोनों एक साथ विराजते है जो की यहाँ के अलावा पूरी दुनिया में और कही नहीं देखने को मिलता है।

बाबा विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है।  इसमें ऊपर लगी हुई गुंबद श्री यंत्र से मंडित है इस स्थान को तांत्रिक सिद्धि के लिए ये उपयुक्त स्थान माना जाता है।

दिव्य स्थान बाबा विश्वनाथ क दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार है जो कि शांति द्वार, कला द्वार , प्रतिष्ठा द्वार और निवृत्ति द्वार है। इन सभी चारों द्वारों का तंत्र में अपना अलग ही महत्व है। क्योंकि पूरी दुनिया में यहाँ के अलावा पूरी दुनिया में कहीं और ऐसी जगह नहीं है जहाँ शिवशक्ति  एक साथ विराजित हो। और साथ ही में तंत्र द्वार भी है।

बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है इस कोण का मतलब होता है की सम्पूर्ण विद्या और हर कला से परिपूर्ण दरबार।। यह तंत्र की 10 विद्याओं का अविश्वसनीय दरबार है जहाँ पर भगवान शिव का नाम ही सब कुछ है  है।

काशी विश्वनाथ मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा की तरफ है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की तरफ है।  इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर प्रवेश करता है। और इसीलिए सबसे पहले मंदिर में प्रवेश करते ही बाबा अघोर का ही दर्शन होता है। और माना जाता है की इनके दर्शन मात्र से मनुष्य के सारे पाप विनष्ट हो जाते है।

अगर भौगोलिक दृष्टि की बात करे तो बाबा विश्वनाथ त्रिशूल पर विराजमान माने जाते है। यहाँ की मैदागिन क्षेत्र जहाँ कभी मन्दाकिनी नदी बहा करती थी और गौदोलिया क्षेत्र जहाँ गोदावरी नदी बहती थी। इन दोनों जगहों के बीच में ही ज्ञानवापी बाबा स्वयं विराजमान होते है।  मैदागिन और गौदोलिया के बीच में ज्ञानवापी थोड़ी ऊपर है जो की त्रिशूल का आकर बनाती है इसीलिए ऐसा माना जाता है की काशी में कभी भी प्रलय नहीं आएगा।

लोगों की ऐसा मानना है कि बाबा विश्वनाथ काशी धाम में राजा रो गुरु दोनों के रूप में विराजित है। माना जाता है की बाबा विश्वनाथ दिन भर गुरु के रूप में भ्रमण करते है तो वहीं रात्रि में जब बाबा का आरती व शृंगार किया जाता है तब ये राजा के रूप में वहां पर आकर विराजमान हो जाते है। इसीलिए इनको राजराजेश्वर भी कहते है।

लोगी की आस्था है की बाबा विश्वनाथ और माँ भगवती जी काशी में इसलिए विराजमान  है की , माना जाता है की देवी भगवती अन्नपूर्णा के रूप में रहकर काशी धाम में रहने वाले सभी लोगों का पेट भरती है तो वहीं बाबा विश्वनाथ मृत्यु के पश्चात तारक मन्त्र देकर उन्हें मुक्ति प्रदान करते है। और ऐसी वजह से बाबा को ताड़केश्वर नाथ के नाम से भी जाना जाता है।

यहाँ कि धारणा है की बाबा विश्वनाथ के अघोर रूप के दर्शन मात्र से ही जन्मों के सभी पाप धूल जाते है। शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ के रूप में विचरण करते है और उनके बारात में सभी भूत प्रेत, पशु पक्षी और देवतागण सम्मिलित होते है।